स्थान----नवापाराखुर्द/सक्ति
जिला-जांजगीर चाम्पा छत्तीसगढ
विधा -कविता(अतिशयोक्ति अलंकार)
विषय--भय ग्रस्त मन
शीर्षक----भय मत करो
मन मेरा था शेर जैसे ।
भय से सियार हो गया ।
चूहा को भी देख थर-थर कांपू ।
सब कुछ बेकार हो गया ।
पत्थर सा मैं पड़ा था ।
भय ने मुझे बिगाड़ा
धूल सा उड़ रहा हूं ।
मुरझाए सा हो गया ।
जब मैं चलता कांपते लोग ।
भय ने मुझको कपां दिया
अब लोगों को देख भांगू ।
हाथी था चींटी सा हो गया ।
कहते थे वो मर्द जा रहा ।
छप्पन इंच सीने वाला ।
भय ने मेरी गिनती हटा दी
घर का न घाट का हो गया ।
भय ने किया भयभीत हैं ।
क्या उचित अनुचित है ।
भय मत करना मैं कह रहा ।
भले मैं शिकार हो गया ।
भय कोई अर्थ नहीं ।
भय कोई धर्म नहीं ।
भय कोई कर्म नहीं ।
इससे मुझे घृणा हो गया ।
भय को मन से दूर रखना ।
इससे न कभी मजबूर रहना ।
भय को दूर रखने वाला ।
जग में मशहूर हो गया ।
No comments:
Post a Comment