ग्राम - बुलाँकी
जिला - रायगढ़ छत्तीसगढ़
विद्या - कविता
विषय - भ्रमित मन
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*भ्रमित मन*
हे भयभीत भय ग्रसित मन,
तुम कब भय से निकल पाओगे।
भ्रमित मन से कब तुम,
जागृति की ओर आओगे।
प्राण भय से ग्रसित मन,
प्राण भय से कैसे निजात पाओगे।
मान भय से कुठाराघात जिंदगी,
तुम कैसे समाज में बिताओगे।
पद भय से असंतुष्ट हो,
धन भय से हो रहे लाचार।
भयभीत जिंदगी कब तक जिओगे,
मत करो मनमानी अत्याचार।
प्रकृति भय से भयंकर समाज में,
अमानवीयता का भय पसरा है।
जहां भी देखो समाज में,
अमानवीयता भय का खतरा है।
प्राकृतिक भय से तो समायिक है,
पर अमानवीय भय हर पल है।
हे भ्रमित भयभीत मन तू,
क्यों भय से ग्रसित है।
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उर्मिला सिदार
रायगढ़ छत्तीसगढ़
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