रायगढ़, छत्तीसगढ़
विषय-वर्तमान परिदृश्य और प्रेम(उदाहरण अलंकार)
विधा -मुक्त छंद काव्य
शीर्षक- प्रेम का बदलता स्वरूप
प्रेम का पल -पल बदलता स्वरूप है
कल त्याग और समर्पण का नाम था प्रेम
आज जरूरत पूरी करने का माध्यम है
जैसे प्रेम प्रेम नही आडंबर का खेल है
समय के साथ कलुषित और दूषित है प्रेम
जैसे ऑडियो और वीडियो कॉल में परिवर्तित है प्रेम
प्रियतम से मिले प्रेम पत्र को हृदय से लगाती
चूमती,संभालती,सिर नवाती, बांचती थी जो
आज एस एम एस के उसी संदेश को
चार-पांच को चिपकाती है
आज प्रेम जैसे फ़ैशन बन गया
ज्यों डेट पे जाना आम हो गया
हर एहसास पे सिमटती थी जो
आज हवस मिटाने के साधन बन गया
प्रेम जो अनन्त और निराकार था
जैसे सीमित और सकुंचित हो गया
मौसम ज्यों बदलता रहता है
त्यों वर्तमान परिदृश्य में प्रेम हो गया।
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