Wednesday, September 30, 2020

लीलाधर कुम्हार की रचना- सत्संग

रचनाकार - लीलाधर कुम्हार
जिला - बलौदा बाजार (छ. ग.)
विषय - सत्संग
विधा - छंद मुक्त कविता 
शीर्षक - सत्संग महिमा
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       //  सत्संग महिमा  //

जीवन का अमृत है सत्संग ।
परम औषधि अद्भुत सत्संग ।।
जीवन का आधार है सत्संग ।
जीने का फल सार है सत्संग ।।
सदाचार सिखलाती सत्संग ।
नैतिक पाठ पढ़ाती सत्संग ।।
मोह निशा को भगाती सत्संग ।
ज्ञान की ज्योति जगाती सत्संग ।।
अतिशय भोग छुड़ाती सत्संग ।
राग - द्वेष भी हटाती सत्संग ।।
प्रेम की गंगा बहाती सत्संग ।
करुणा - दया लुटाती सत्संग ।।
भक्ति - रस छलकाती सत्संग ।
उर में प्रभु प्रकटाती सत्संग ।।
आत्मानंद बरसाती सत्संग ।
मोक्ष मार्ग बतलाती सत्संग ।।
दुर्गुण-दोष भगाती सत्संग ।
जीवन को महकाती सत्संग ।।
दुःख चिन्ता  भय हरती सत्संग ।
कल्मष क्लेश मिटाती सत्संग ।।
बल - बुद्धि को बढ़ाती सत्संग ।
शक्ति-पराक्रम लाती सत्संग ।।
सुख - शांति का स्रोत है सत्संग ।
फलदायी  उद्योग  है  सत्संग ।।
पावन-पावन उज्ज्वल सत्संग ।
मंगलकारी  निर्मल   सत्संग ।।
मधुर-मधुर मिष्ठान्न है सत्संग ।
दिव्यातिदिव्य पकवान है सत्संग ।।
सुंदर सरस सुहावन सत्संग ।
है अनमोल रतन धन सत्संग ।।
जीव - शिव का मेल है सत्संग ।
सत्य सनातन खेल है सत्संग ।।
जगत-जाल को काटे सत्संग ।
मिथ्या प्रपंच हटाते सत्संग ।।
पथ वैराग्य दिखाती सत्संग ।
शाश्वत को समझाती सत्संग ।।
मरणोपरांत निभाती सत्संग ।
देहाध्यास पिघलाती सत्संग ।।
निज का बोध कराती सत्संग ।
सर्वकला  गुण  देती सत्संग ।।
प्रेरणादायी  पुंज  है  सत्संग ।
मन मधुकर का कुंज है सत्संग ।।
ऋषि-मुनियों की वाणी सत्संग ।
नित्य सुखद कल्याणी सत्संग ।।
गुरु - शिष्य का नाता सत्संग ।
ब्रम्हज्ञान का प्रसाद सत्संग ।।
संतों का सान्निध्य है सत्संग ।
मिलते अमित पुण्य से सत्संग ।।
हरि कथा गुणगान है सत्संग ।
वेदोपनिषद पुराण सत्संग ।।
गीता और  रामायण  सत्संग ।
नीर - क्षीर का न्याय है सत्संग ।।
संस्कृति की पहचान है सत्संग ।
धर्म - कर्म का प्राण है सत्संग ।।
एक सत्य शिव सुन्दर सत्संग ।
ध्यान भजन मन-मंदिर सत्संग ।।
विमल विवेक जगाती सत्संग ।
दैवी  सम्पदा  देती  सत्संग ।।
जीवन का विश्वास है सत्संग ।
सर्वांगीण विकास है सत्संग ।।
दृढ़ निश्चय और निष्ठा सत्संग ।
श्रद्धा की पराकाष्ठा सत्संग ।।
मानवता की सुगन्ध सत्संग ।
विश्वशांति का प्रबन्ध सत्संग ।।
है  ईश्वरीय  विभूति  सत्संग  ।
परम दिव्य अनुभूति सत्संग ।।
अद्वितीय अकथनीय सत्संग ।
नित्य नवीन श्रवणीय सत्संग ।।
लोक परलोक सँवारे सत्संग ।
कुछ भी नहीं बिगाड़े सत्संग ।।
महिमा का भण्डार है सत्संग ।
आस्था और संस्कार है सत्संग ।।
जीवन मे  अपनाओ  सत्संग ।
सेवन  करो  कराओ  सत्संग ।।
है अमोघ फलवाली सत्संग ।
कभी न जाये खाली सत्संग ।।

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