जिला :- महासमुन्द
विषय :- कृषक
शीर्षक :- कर्मठ कृषक
विधा :- छंद मुक्त कविता
अलंकार :- विशेषोक्ति अलंकार
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कर्मठ कृषक करे दिन - रैन श्रम,
हो कृषि कार्य में लीन।
उजड़े - उजड़े फिर भी खेत हैं,
बिल्कुल ही फसल हीन।
गरजे बादल, बरसे मेघा,
फिर भी रह गई धरती प्यासी।
किटों का आतंक छाया है,
लहराते फसल मगर ना अन्न जरा सी।
सेवक है वह मां धरती का,
निज रक्त - स्वेद से सिंचे खेत।
कई दफा प्राकृतिक कारण से,
सारी मेहनत हो जाता रेत।
भले मिले ना सम्मान सही पर,
कभी ना श्रम से मुंह मोड़ा।
निज कर के बल पर जिसने,
हर मुश्किल का मुंह तोड़ा।
अन्न खिलाता है जग को,
जग कहता जिसे अन्नदाता।
निज भुज बल से भाग्य बनाता,
है निज का वह भाग्य विधाता।
दुख के बादल छाए फिर भी,
लिए सदा मुख में मुस्कान।
जग के जन जन के पालनकर्ता,
है कर्मठ कृषक महान।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने कृषक के जीवन का वर्णन करते हुए कहा है कि कर्मठ कृषक महान है, वह अपना सर्वस्व कृषि कार्य में समर्पित कर देता है।
काव्य अलंकरण के लिए रचनाकार ने विशेषोक्ति अलंकार का प्रयोग किया है।
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