Wednesday, September 30, 2020

संतराम कुम्हार की रचना- मजबूरी का दर्द

रचनाकार -  संतराम कुम्हार 
   जिला -  बलौदाबाजार (छ. ग.) 
   शीर्षक  -  " मजबूरी का दर्द " 
     विधा - छंदमुक्त कविता 
 
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इज्जत की जिंदगी मेरी भी थी, 
हालातों ने मजबूर बना दिया। 
कोई शौक नहीं इस नर्क में आना, 
पेट की भूख ने तवायफ बना दिया।। 

बदनाम हैं गलियाँ मेरी, 
मैं भी बदनाम हूँ। 
करती भले ही जिस्म का धंधा, 
पर मैं भी तो इंसान हूँ।। 

हर चीख मेरी दुःख बयाँ करती है। 
आँसू हर पल मेरी भी बहती है। 
फिर भी जिस्म नोचती मेरी क्यों ?
खामोशी से सब कुछ सहती है।। 

जिस्म बिकता रातों को मेरी, 
बेआबरू रोज मैं होती हूँ।
तपती शरीर ज्वर-बुखार से भले , 
बेसहारा हूँ, फिर भी साथ सोती हूँ।। 

आहें मेरी कोई सुनता नहीं, 
बिस्तर में ही दफन हो जाती है। 
कभी नंगी होती जिस्म मेरी,
कभी कपड़े ही कफन बन जाती है।। 
                   
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 संतराम कुम्हार
 बलौदाबाजार (छ. ग.)

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