रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुन्द
विषय:- अमावस्या
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक :- दुःख का अमावस
अलंकार :- वाक्यार्थोपमा अलंकार
#######################
नियती से नित घटता - बढ़ता,
दिखता - छूपता अक्सर चांद।
जैसे जीवन में आते हैं।
सुख व दुख दोनों आयाम।
जीवन में आते हैं दुःख,
जैसे अमावस में गहरा तम।
पर सुख की पूर्णिमा ना होगी,
ये तो मनुज है मन का भ्रम।
जीवन चक्र भी अद्भुत बड़ा है,
क्या - क्या रूप दिखाता है?
सुख का चांद नजर ना आता,
वह दिन अमावस हो जाता है।
पर अक्सर अमावस जग में,
नव अवसर ले आता है।
जैसे कार्तिक अमावस्या में,
मनवा दीप जलाता है।
और जग की भी रीत यहीं है,
अजर - अमर का ना कोई मोल।
दुख के बाद सुख का मिल जाना,
जैसे मिले मोती अनमोल।
दुख भरे अमावस का जीवन में,
अनुपम है जोगी स्थान।
वरना जिसे बस सुख ही मिलता,
उस उर में होता अभिमान।
हे ईश्वर पूर्णिमा संग सदा,
मिले मुझे अमावस भी।
कि फिर मन में पनप ना जाए,
घमण्ड भाव ऐसे कभी।
सुख का प्रकाश व दुख का तम,
ज्यों एक सिक्के के हैं दो पक्ष।
सुख की मुझे मिले पूर्णिमा,
पर दुख का अमावस भी हो समक्ष।
#######################
व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने जीवन में सुख को पूर्णिमा तथा दुख को अमावस्या की संज्ञा देते हुए दुख रूप अमावस का जीवन में महत्व को प्रकट करने का प्रयास किया है।
काव्य अलंकरण के लिए रचनाकार ने वाक्यार्थोपमा अलंकार के प्रयोग का प्रयास किया है।
No comments:
Post a Comment