संबलपुर,जिला-कांकेर,( छ. ग.)
विषय -समाज सेवा
*समाज-सेवा*
समाज सेवा अर्थात समाज की भलाई के लिए ही निस्वार्थ भाव से जो कार्य किया जाएं वह समाज सेवा कहलाता है ।समाज सेवा एक शैक्षिक एवं व्यावसायिक विधा है जो सामुदायिक संगठन एवं अन्य विधियों द्वारा लोगों एवं समूहों के जीवन स्तर को उन्नत बनाने का प्रयत्न करता है ।सामाजिक कार्य का अर्थ है, सकारात्मक और सक्रिय हस्तक्षेप के माध्यम से लोगों और उनके सामाजिक माहौल के बीच अंतर क्रिया प्रोत्साहित करके व्यक्तियों की क्षमताओं को बेहतर करना है, ताकि वह अपनी जिंदगी की जरूरतें पूरी करते हुए अपनी तकलीफों को कम कर सके। ऐसे में समाज कार्य लोगों की आकांक्षाओं की पूर्ति करने और उन्हें अपने ही मूल्यों की कसौटी पर खरे उतरने में सहायक होता है। समाज सेवा अन्य व्यवसायों से सर्वथा भिन्न होती है ,क्योंकि समाज सेवा उन सभी आर्थिक एवं मनोवैज्ञानिक कारकों का निरूपण कर उसके परिपेक्ष्य में कार्यान्वित होती है ।जो व्यक्ति एवं पर्यावरण, परिवार ,समुदाय, तथा समाज को प्रभावित करती हैं। समाज सेवा का उद्देश्य व्यक्तियों, समूह, और समुदायों का अधिकतम हित साधन करना होता है ।अतः सामाजिक कार्यकर्ता सेवार्थी को उसकी समस्याओं का समाधान करने में, सक्षम बनाने में ,और सुधार लाने का प्रयत्न करता है ,और अपने लक्ष्य की प्राप्ति के निमित्त सेवा करने वाले की क्षमता एवं रचनात्मक शक्तियों का प्रयोग करता है ।समाज सेवा में संबंध संपूर्ण सहायता का आधार है। समाज सेवा अत्यंत महत्वपूर्ण होता है ,और समाज के लिए कल्याणकारी है ।समाज में उसी को आदर सम्मान मिलता है ,जो उद्योग परिश्रम और उत्साह पूर्वक अपना और दूसरों का अर्थ समस्त समाज का हित साधन करता है। इसके विपरीत जो व्यक्ति धन, वैभव ,शारीरिक शक्ति, विद्या, बुद्धि होने पर भी निकम्मा, आलसी होकर पड़े रहने में या भोग विलास में ही सुख मानता है, वह कदापि प्रतिष्ठा के योग्य नहीं है ।वह समाज के लिए एक हाथ पैर कटे हुए व्यक्ति के समान भार स्वरूप होता है।निःस्वार्थ समाज सेवा मनुष्य को उदात्तता की ओर ले जाता है।
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, कांकेर, (छ. ग.)
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