स्थान-----नवापाराखुर्द/सक्ती
जिला----जांजगीर -चाम्पा
राज्य---छत्तीसगढ
विधा- कविता (निदर्शना अलंकार)
शीर्षक - घर-घर पितर
व्याख्या--कवि के द्वारा पितृपक्ष को पितरों का पक्ष माना है। घर-घर आते हैं उनकी पूजा होती है उनके नाम से विविध प्रकार के व्यंजन बनाए एवं खिलाये जाते हैं।क्या हमारे पितर वास्तव में आते हैं जो हम खिलाते हैं उसको ग्रहण करते हैं । इससे किनको लाभ है और किन्हे नुकसान इस संबंध में शिक्षितों का जो कहना है वर्णन किया गया है ।
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घर -घर पितर
पितृपक्ष पितरों का पक्ष, घर- घर पितर आते हैं ।
आते अलग-अलग तिथि में,हम पूजते वो पातें है ।
इस विचार धारा से,
बंधा हुआ संसार ।
संभव असंभव मध्य में,
फल फूल रहा व्यापार ।
आते हैं खाते हैं कहकर,हम विविध व्यंजन बना खिलाते हैं ।
इसके कारण कर्ज हो रहे,
कर्ज से लोग रो रहे ।
फिर भी कम यह नहीं हो रहे,
जागते -जागते सब सो रहे ।
प्रत्यक्षों की घर सेवा नहीं,अप्रत्यक्षों पर मर जाते हैं ।
घर में होता जैसे त्योहार,
एक नहीं यह बार-बार ।
युगों-युगों से चली आ रही,
है क्या जीवन में दरकार ।
अगर नहीं तो इस राह को,क्यों नहीं भूल पाते हैं ।
किसको इससे फायदा है,
किसको इससे नुकसान ।
जान रहा है चुप बैठा,
रुढ़ी से बंधा इंसान ।
सोच रहा गलत हो रहा, फिर भी राह पर जातें हैं ।
अगर आते तो रह जाते,
जाने की क्या जरुरत है ।
जो चला गया वह आयेगा कैसे,
बस बात ही खूबसूरत है ।
हमारे मन भी कम नहीं,एक यही चर्चा चलाते हैं ।
वेद पुराण उसी से भरे हैं,
उसी बात को हम रखे हैं ।
शिक्षा सबको धो रहा है,
दो भागों में लोग बंटे हैं ।
पढ़े-लिखे समझदार लोग,इस परदा को उठाते हैं ।
गिरधारी लाल चौहान
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