Tuesday, September 29, 2020

गावस्कर कौशिक की रचना- मन

रचनाकार- गावस्कर कौशिक
जिला - सुकमा, छत्तीसगढ़
विषय- भयग्रस्त मन

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भयग्रस्त मन जब  हो जाते हैं
रस्सी में भी साँप नजर आते हैं
सशंकित रहते हैं हर पल मन
अदृशय डर  हमेशा  सताते हैं

जब शंका से हम घिर जाते हैं
तब मन भयभीत हो सताते हैं
आसान सी राह में भी हरदम
असफलता की डर रुलाते हैं

जीवन नैय्या के इस सागर में
भय से मन हिचकोले खाते है
दिन के चमकती उजालों में भी 
काली अँधेरी रात नजर आते हैं

जब भी भय मन में सवार हो जाते हैं
बड़े बड़े ज्ञानी भी आपा खो जाते हैं
सूरज डूबने के भय से भयभीत हो
धनुर्धर अर्जुन भी निःशस्त्र हो जाते हैं

चंचल मन पर लगाम जो लगाते हैं
भय के छाया से वो मुक्त हो जाते हैं
मन में दृढ़ विश्वास रख जप हरि नाम 
हर भय व दुःख मन से मिट जाते हैं
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      ~गावस्कर कौशिक
       सुकमा, छत्तीसगढ़

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