Tuesday, September 8, 2020

डॉ ओमकार साहू "मृदुल" की रचना- सुलगते सवाल

रचनाकार - डॉ ओमकार साहू "मृदुल"
निवास - प्रेमनगर, सूरजपुर।
शीर्षक - *सुलगते सवाल*
विधा :- महाश्रृंगार छंद
मात्रा भार 16-16-13
**********************

*उफनते मन में प्रश्न हजार, सुनादो फिर गीता का सार*
*यही मैं सोच रहा हूँ.....*
*सुमन शूलों में हो तक़रार, नहीं अब गूँजते राग मल्हार,*
*यही मैं सोच रहा हूँ।*

1. जहाँ झूठे होते हैं नाद, जहाँ वोटों तक हो संवाद।
    कृषक के नैनों से बरसात, नहीं कुछ लगता जिनके हाथ।

*चिकित्सक स्वयं पड़ा बीमार, दवाएँ असरहीन बेकार*
*यही मैं सोच रहा हूँ....*
*सुमन शूलों में हो तक़रार, नहीं अब गूँजते राग मल्हार,*
*यही मैं सोच रहा हूँ।*
 
2. सुता धन रखते हैं मनुहार, सुता ही कोख़ मिटाये मार।
    मचाये वहसी हाहाकार, अनंतिम विवश करें व्यापार।

*न हो बेटी पर अत्याचार, बनायें बेटी को दमदार ..*
यही मैं सोच रहा हूँ .....
*सुमन शूलों में हो तक़रार, नहीं अब गूँजते राग मल्हार,*
*यही मैं सोच रहा हूँ।*

3. बनाते दीनन को लाचार, न भाये नेता का व्यवहार,
    बढ़े नेता अफसर में प्यार, मिलावट लीला अपरंपार।

*दिखे सुरसा सा भ्रष्टाचार, लुटेरे थाने के रखवार...*
यही मैं सोच रहा हूँ.....
*सुमन शूलों में हो तक़रार, नहीं अब गूँजते राग मल्हार,*
*यही मैं सोच रहा हूँ।*
4. 
नशे का गरम हुआ बाजार, बचाओ जनसंख्या की मार,
ठगे जाते हलधर हरबार, धरा की प्रलयंकारी मार।

*लगाने फाँसी को तैयार, किसानें या हो बेरोज़गार...*
यही में सोच रहा हूँ.....
*सुमन शूलों में हो तक़रार, नहीं अब गूँजते राग मल्हार,*
*यही मैं सोच रहा हूँ।*

5. कहाँ धड़कन में बची है जॉ, जहाँ रुपयों का हो ईमान।
    पुते सूरत में साज समान, दिखावा अधर करे मुस्कान।

*उजाड़े अपने ही घर-द्वार, रखें हैं दो धारी तलवार .....*
यही मैं सोच रहा हूँ....
*सुमन शूलों में हो तक़रार, नहीं अब गूँजते राग मल्हार,*
*यही मैं सोच रहा हूँ।*
         =====08/09/2020=====
     डॉ ओमकार साहू "मृदुल"
          प्रेमनगर, सूरजपुर

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