निवास - प्रेमनगर, सूरजपुर।
शीर्षक - *सुलगते सवाल*
विधा :- महाश्रृंगार छंद
मात्रा भार 16-16-13
**********************
*उफनते मन में प्रश्न हजार, सुनादो फिर गीता का सार*
*यही मैं सोच रहा हूँ.....*
*सुमन शूलों में हो तक़रार, नहीं अब गूँजते राग मल्हार,*
*यही मैं सोच रहा हूँ।*
1. जहाँ झूठे होते हैं नाद, जहाँ वोटों तक हो संवाद।
कृषक के नैनों से बरसात, नहीं कुछ लगता जिनके हाथ।
*चिकित्सक स्वयं पड़ा बीमार, दवाएँ असरहीन बेकार*
*यही मैं सोच रहा हूँ....*
*सुमन शूलों में हो तक़रार, नहीं अब गूँजते राग मल्हार,*
*यही मैं सोच रहा हूँ।*
2. सुता धन रखते हैं मनुहार, सुता ही कोख़ मिटाये मार।
मचाये वहसी हाहाकार, अनंतिम विवश करें व्यापार।
*न हो बेटी पर अत्याचार, बनायें बेटी को दमदार ..*
यही मैं सोच रहा हूँ .....
*सुमन शूलों में हो तक़रार, नहीं अब गूँजते राग मल्हार,*
*यही मैं सोच रहा हूँ।*
3. बनाते दीनन को लाचार, न भाये नेता का व्यवहार,
बढ़े नेता अफसर में प्यार, मिलावट लीला अपरंपार।
*दिखे सुरसा सा भ्रष्टाचार, लुटेरे थाने के रखवार...*
यही मैं सोच रहा हूँ.....
*सुमन शूलों में हो तक़रार, नहीं अब गूँजते राग मल्हार,*
*यही मैं सोच रहा हूँ।*
4.
नशे का गरम हुआ बाजार, बचाओ जनसंख्या की मार,
ठगे जाते हलधर हरबार, धरा की प्रलयंकारी मार।
*लगाने फाँसी को तैयार, किसानें या हो बेरोज़गार...*
यही में सोच रहा हूँ.....
*सुमन शूलों में हो तक़रार, नहीं अब गूँजते राग मल्हार,*
*यही मैं सोच रहा हूँ।*
5. कहाँ धड़कन में बची है जॉ, जहाँ रुपयों का हो ईमान।
पुते सूरत में साज समान, दिखावा अधर करे मुस्कान।
*उजाड़े अपने ही घर-द्वार, रखें हैं दो धारी तलवार .....*
यही मैं सोच रहा हूँ....
*सुमन शूलों में हो तक़रार, नहीं अब गूँजते राग मल्हार,*
*यही मैं सोच रहा हूँ।*
=====08/09/2020=====
डॉ ओमकार साहू "मृदुल"
प्रेमनगर, सूरजपुर
No comments:
Post a Comment