ग्राम -बुलाँकी
जिला -रायगढ़ (छत्तीसगढ़ ) विधा -कविता
शीर्षक -नारी
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*नारी*
(1)
नारी को अबला कहते,
जिनके समझ के फेर।
अबला तो कल्याणी है,
ये जहाँ तू देख।।
(2)
नारी है समाज की शोभा,
इससे नही चलती मानव परंपरा।
नारी बिना जग अधिंयारा,
नारी है जग का उजियारा।
(3)
सज्जन करते तुझे सम्मान,
ऋषि कहते तू महान।
पर भ्रमित मानव कहते,
उनके लिए तू अभिशाप।
(4)
तू आती है कल्याणी,
जग में कल्याण के लिए।
तुझे कब अवसर मिला,
तू तो दौलत की तुला में तौला।
(5)
तेरी क्या?औकात नारी,
जो उसे तू क्या कहेगी।
तू अपना अरमान दबाये,
बस यातना सहनी है।
(6)
तुझे उपेक्षा करने वाले,
तुझे क्या? न्याय दे पाएंगे।
भ्रमित मंशा में दबे इंसान,
क्या?तेरा सम्मान कर पाएंगे।
(7)
लालची तुसझे कब खुश,
उसे अपनी करतूत करनी है।
धन के पुजारी पाखण्डियों को,
बस तेरी अरमानों की बलि देनी है।
(8)
तू संस्कार की देवी है नारी,
तेरी संस्कार को करे जग सम्मान।
तेरी संस्कार से सांस्कारिक होकर,
दुश्मन भी करे तुझे प्रणाम।
(9)
ऐसी संस्कार भर दो मनु में,
कलुषित समाज की कलंक मिट जाए।
तेरी शीतल छाया पा कर,
हर परिवार स्वर्ग बन जाये।
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उर्मिला सिदार
ग्राम-बुलाँकी
जिला- रायगढ़(छग)
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