Monday, September 14, 2020

पुष्पा पटनायक कृत आलेख - हिन्दी

रचयिता- पुष्पा पटनायक 
स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़ 
विधा- आलेख (हिंदी हैं हम)
शीर्षक- हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं....क्यों?
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हिंदी भाषा की लिपि देवनागरी लिपि है जो कि 1000 वर्ष के आसपास मानी जाती है। करोड़ों भारतीय हिंदी का उपयोग मातृभाषा के रूप में करते हैं ।  विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में जो आंकड़े हैं उन में हिंदी का स्थान तीसरा माना जाता है ।
              हिंदी भाषा की  शब्दावली अक्षरात्मक विधि कहलाती है। यह विश्व में प्रचलित सभी लिपियों की अपेक्षा अधिक पूर्णता  लिए है इसकी लिखित और उच्चारित रूप में कोई अंतर नहीं पड़ता प्रत्येक ध्वनि संकेत यथावत लिखा जाता है  ।इसमें कुल 52 अक्षर है जिसमे 14 स्वर और 38 व्यंजन के अक्षर की क्रम व्यवस्था विन्यास भी बहुत ही वैज्ञानिक है। कुछ विद्वानों का मत है कि  देव नगर काशी में प्रचलित प्रचलन के कारण इसका नाम देवनागरी  भी पड़ा है।          
              यह हमारी विडंबना है कि देश में राजभाषा के रूप में हिंदी को संविधान लागू होने के पूर्व कभी भी आधिकारिक मान्यता नहीं मिली थी । मुगलों के समय राजभाषा के रूप में अरबी ,फ़ारसी का बोलबाला था ,तो अंग्रेजों ने अंग्रेजी और उर्दू को राजकाज चलाने में इस्तेमाल किया ।  स्वतंत्रता  प्राप्ति के बाद भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 से लेकर 351 अनुच्छेद में हिंदी को देवनागरी लिपि में राजभाषा का दर्जा दिया गया है।  14 सितंबर 1949 को राजभाषा समिति ने हिदी को राजभाषा की  मान्यता दी और 26 जनवरी 1950 से संविधान लागू हुआ और हिंदी को राजभाषा के रूप में संवैधानिक मान्यता मिली। संविधान के बाद 15 वर्षों तक अर्थात 1965 तक संघ की भाषा के रूप में अंग्रेजी का प्रयोग किया जाना था , और संसद को यह अधिकार दिया गया कि वह चाहे तो संघ की भाषा के रूप में अंग्रेजी के प्रयोग की अवधि को बढ़ा सकती थी इसलिए संसद में 1963 में संघ भाषा के रूप में अंग्रेजी का प्रयोग 1971 तक बढ़ा दिया और फिर बाद में अंग्रेजी का प्रयोग अनिश्चितकाल तक रहेगा कह दिया गया । यही वह निर्णय है जिसने हिंदी को कहीं ना कहीं पीछे धकेलने में कोई कसर ना रखी। हिंदी भाषा सभी लिपियों की अपेक्षा पूर्णता लिए  है यह भाषा वैज्ञानिक अक्षर विन्यास के साथ किसी भी परिस्थिति का चाहे वह साहित्य पत्र-पत्रिका हो या कार्यालय कार्य करने में , सक्षम है। 
                 लेकिन आज भी सरकार ने राष्ट्रभाषा के रूप में राजभाषा को स्वीकार नहीं किया है समाज में जिस भाषा का प्रयोग होता है ,साहित्य की भाषा उसी का परिष्कृत रूप है भाषा का आदर्श रूप वही है जिसमें विशाल समुदाय अपने विचार प्रकट करता है । लेकिन रिकॉर्ड पर ऐसा कोई आदेश या प्रावधान मौजूद नहीं है जिसमें हिंदी को देश की राष्ट्रभाषा घोषित किया गया हो । बहुतों को पता नहीं है कि हिंदी केवल राजभाषा या सरकारी भाषा है राष्ट्रभाषा नहीं है। आज की सरकार ने राष्ट्रभाषा के रूप में राजभाषा को स्वीकार नहीं किया है मगर जनता ने इसे राष्ट्रभाषा के रूप में अंगीकार कर लिया है इसकी व्यापक स्वीकृति शीघ्र इसे विश्व भाषा का दर्जा प्रदान करवाएगी ।
        आज समाज भौतिकवादी हो गया है और इसकी सोच अर्थ वादी होती जा रही है और विश्व बाजारवाद पर निकल पड़ा है हम सब जानते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण होता है और हमारा हिंदी साहित्य आज अर्थवादी हो चला है हमारा लेखक याचक है और प्रकाशक दाता ।अंग्रेजी का वर्चस्व भी अर्थवादिता में झलकता है ।मौजूदा समय में भी विश्व स्तर पर अगर देखें तो अंग्रेजी के सबसे अच्छे लेखक भारतीय मूल से आते हैं ।
                  गीता जैसे काव्य होने के बाद भी हम हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा ना दिला सके ।लेकिन अगर हम ऐसी व्यवस्था बनाये  कि राजभाषा में प्राप्त पत्रों के जवाब शत-प्रतिशत राजभाषा में दिए जाएं और हिंदी ही नहीं अन्य भाषा क्षेत्रों में भी पूर्णत्या राजभाषा हिंदी का प्रयोग सुनिश्चित किया जाए तो हम एक दिन हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने में शायद कामयाब हो पाएंगे ।

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