Monday, September 21, 2020

जगतसिंह ठाकुर'बंजारीवाले'जी की रचना- नदी

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
स्थान--सारंगढ़ , रायगढ़ { छग }
विधा--कविता
शीर्षक--नदी
नदी   होती  जीवनदायिनी , जग का प्राणाधार ।
प्यास बुझाये  जीवजंतु की , बहती शीतल धार ।।
निर्मल जल  सदैव  देती है , पीते   सारे    लोग ,
जल ही जीवन  होता प्यारे , होता  पहला भोग ।
निस्वार्थ होके  नदी  बहती , ताप को  दे निवार ।।
प्यास बुझाये...........................................।।१।।
तटवर्ती   किसान   हैं  सारे , सींचा  करते  खेत ,
सदैव    वे   उत्पादन   लेते , भारी   हर्ष   समेत ।
नंगे   को  वस्त्र   देती  नदी , भूखे   को  आहार ।।
प्यास बुझाये...........................................।।२।।
कलकल  नाद से  है हमेशा , मन को लेती मोह ,
हमेशा  बना   रहता  इनका , किनारों में विछोह ।
जलचर प्राणी की  नदी रही , जैसे     प्राणाधार ।।
प्यास बुझाये...........................................।।३।।
तन मन का मैल  धोये नदी , तटपर    तीर्थानेक ,
मानव  सभ्यता संभव हुआ , शहर  एक से एक ।
माँ का दर्जा  नदी को मिला , सरिता  तारणहार ।।
प्यास बुझाये............................................।।४।।
प्रीतम मिलन की आशधारी , नदी रहे  गतिमान ,
सागर से सरिता मिल जाती , पाती निश्चल ठान ।
नदी सिन्धु से मिलती जाके , होती     एकाकार ।।
प्यास बुझाये...........................................।।५।।
निकल नदी पर्वत-पहाड़ से , उर  पत्थर के चीर ,
लक्ष्य पाने को  बढ़े  सरिता , रही  धीर - गम्भीर ।
कहती 'ठाकुर' बाधा  तोड़ो , बढ़ो नित लगातार ।।
प्यास बुझाये............................................।।६।।
                          ०××××××०
व्याख्या--नदी के उद्गम से लेकर सिन्धु प्रवेश तक
              का एवं उसकी उपयोगितापर प्रकाश
              डालने का प्रयास किया गया है ।

No comments:

Post a Comment

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...