रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
स्थान--सारंगढ़ , रायगढ़ { छग }
विधा--कविता
शीर्षक--नदी
नदी होती जीवनदायिनी , जग का प्राणाधार ।
प्यास बुझाये जीवजंतु की , बहती शीतल धार ।।
निर्मल जल सदैव देती है , पीते सारे लोग ,
जल ही जीवन होता प्यारे , होता पहला भोग ।
निस्वार्थ होके नदी बहती , ताप को दे निवार ।।
प्यास बुझाये...........................................।।१।।
तटवर्ती किसान हैं सारे , सींचा करते खेत ,
सदैव वे उत्पादन लेते , भारी हर्ष समेत ।
नंगे को वस्त्र देती नदी , भूखे को आहार ।।
प्यास बुझाये...........................................।।२।।
कलकल नाद से है हमेशा , मन को लेती मोह ,
हमेशा बना रहता इनका , किनारों में विछोह ।
जलचर प्राणी की नदी रही , जैसे प्राणाधार ।।
प्यास बुझाये...........................................।।३।।
तन मन का मैल धोये नदी , तटपर तीर्थानेक ,
मानव सभ्यता संभव हुआ , शहर एक से एक ।
माँ का दर्जा नदी को मिला , सरिता तारणहार ।।
प्यास बुझाये............................................।।४।।
प्रीतम मिलन की आशधारी , नदी रहे गतिमान ,
सागर से सरिता मिल जाती , पाती निश्चल ठान ।
नदी सिन्धु से मिलती जाके , होती एकाकार ।।
प्यास बुझाये...........................................।।५।।
निकल नदी पर्वत-पहाड़ से , उर पत्थर के चीर ,
लक्ष्य पाने को बढ़े सरिता , रही धीर - गम्भीर ।
कहती 'ठाकुर' बाधा तोड़ो , बढ़ो नित लगातार ।।
प्यास बुझाये............................................।।६।।
०××××××०
व्याख्या--नदी के उद्गम से लेकर सिन्धु प्रवेश तक
का एवं उसकी उपयोगितापर प्रकाश
डालने का प्रयास किया गया है ।
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