Wednesday, September 30, 2020

डिजेन्द्र कुर्रे कोहिनूर की रचना- मन

रचनाकार - डिजेन्द्र कुर्रे कोहिनूर
पिपरभावना, बलौदाबाजार(छ ग)
विधा - गीत
विषय - द्वेष कपट मन से त्यागों
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गीत - द्वेष कपट मन से त्यागो
★★★★★★★★★★★★
कब तक सोओगे जग वालों,
अब तो नींदों से जागो।
पुण्य डगर के पथिक बनों जी,
द्वेष कपट मन से त्यागो।
★★★★★★★★★★★
डगर अंधेरा जहाँ भी देखो,
तुम उजियार बनाना।
कुचले पिछले थके जनों पर,
प्रेम सरस रस बरसाना।
जन से जन को दूर करे वह,
खाई नहीं बनाओ तुम।
कम कम से थोड़े पल को,
प्रभु भजन को गाओ तुम।
जो इस जग के लिए शुभम हो,
वर वह ही तुम माँगों।
पुण्य डगर के पथिक बनों जी,
द्वेष कपट मन से त्यागो।
★★★★★★★★★★★
जिन बातों में धर्म नही हो,
कभी नहीं तुम वह कहना।
जहाँ रहे अन्याय पनपता,
आँख मूंदकर मत सहना।
मानवता का भार हरण,
करने के खातिर जीवन तुम।
बात सुधा की धार जगत को,
सदा गरल ही पीना तुम।
निज कर्तव्यों को पहचानों,
नहीं स्वयं से तुम भागों।
पुण्य डगर के पथिक बनों जी,
द्वेष कपट मन से त्यागो।
★★★★★★★★★★★★★
रचनाकार-डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर"
पीपरभावना,बलौदाबाजार(छ.ग.)

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