Friday, September 11, 2020

दुर्ग से अनुरमा शुक्ला की रचना- मंगली कन्या

रचनाकार- अनुरमा शुक्ला
  स्थान- दुर्ग (छ.ग.)
विधा- मुक्त, निदर्शना अलंकार

  शीर्षक- *मंगली कन्या*

सुंदर सुयोग्य गुणी थी कन्या
वर था अनपढ़ बिगड़ा नवाब,
बात होने ही वाली थी पक्की
देखने लगे दोनों की जन्मपत्री

देखते ही दो टूक दिया जवाब
अब ना होगा दोनों का मिलाप
आसमान हमारा बेटा है 
 तो बेटी तुम्हारी जमीन
होगा ना अब मेल कभी
लड़की है, अशुभ मंगली।

लौट रहे थे घमंड से भरपूर
 लड़का भी था नशे में चूर,
हो गई  लापरवाही, दुर्घटना घटी,
माँ ने कहा, फिर रास्ता काटी बिल्ली,
बुझ गया कुल का दीपक ,
रहा ना कोई वारिस,
फिर भी हर किसी ने यही कहा, 
किस अशुभ घड़ी में देखी, 
 हमने वह कलमुंही।

साल बीते अखबारों में 
 एक खबर छपी,
वो कन्या अपने देश की 
बनी प्रहरी ,
उस कुल- नाशक से बेमेल थी
 इस देश -ज्योति की जोड़ी,
अंधविश्वास की बेड़ीयाँ
 बेटियों ने ही है तोड़ी।।
             
             अनुरमा शुक्ला
               दुर्ग( छ.ग.)

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