*रचनाकार - संतराम कुम्हार*
*जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)*
*शीर्षक - " जीवन की अमावस्या "*
*विधा - छंदमुक्त कविता*
*अलंकार* - *वाक्यार्थोपमा* *अलंकार*
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जीवन का यह अनोखा सफर,
कभी पूर्णिमा तो कभी अमावस का काली रात।
ज्यों अंधियारी निशा के बाद,
होता है सूरज के साथ सुप्रभात।।
रात के अंधेरे से तू न घबराना,
मुसीबत ही जीना सिखाती है।
ज्यों टिमटिमाते रात के जुगनू,
राहगीर को मंजिल तक पहुँचाती है।।
सुख-दुःख आते दिन-रात जैसे,
हर परिस्थिति से रुबरु कराती है।
सुख में न करना गुरुर कभी,
दुःख में हौसला रखना सिखाती है।।
माना जिंदगी मुश्किलों का समुंदर है।
किसको पता कैसा तेरा मुकद्दर है।
न समझो तो मूरझे फूल हैं,
समझो तो गुलदस्ते-सा सुन्दर है।।
नदी चट्टानों से ज्यों न घबराती,
डंटकर मुकाबला करती है।
जिंदगी उसी की खुशहाल रहती,
धूप-छाया में भी जो हरपल,
मुस्कान बरकरार करती है।।
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*वाक्यार्थोपमा* *अलंकार* *का प्रयोग* -
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1. ज्यों अंधियारी निशा के बाद,
होता है सूरज के साथ सुप्रभात।
2. ज्यों टिमटिमाते रात के जुगनू,
राहगीर को मंजिल तक पहुँचाती है।
3. नदी चट्टानों से ज्यों न घबराती,
डंटकर मुकाबला करती है।
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