Wednesday, September 16, 2020

बलौदाबाजार से संतराम कुम्हार की रचना-जीवन की अमावस्या

*रचनाकार -  संतराम कुम्हार* 
   *जिला -  बलौदाबाजार (छ. ग.)* 
   *शीर्षक  -  " जीवन की अमावस्या "* 
     *विधा - छंदमुक्त कविता* 
 *अलंकार* -  *वाक्यार्थोपमा* *अलंकार* 
---------------------------------

जीवन का यह अनोखा सफर, 
कभी पूर्णिमा तो कभी अमावस का काली रात। 
ज्यों अंधियारी निशा के बाद, 
होता है सूरज के साथ सुप्रभात।। 

रात के अंधेरे से तू न घबराना, 
मुसीबत ही जीना सिखाती है। 
ज्यों टिमटिमाते रात के जुगनू,
राहगीर को मंजिल तक पहुँचाती है।। 

सुख-दुःख आते दिन-रात जैसे, 
हर परिस्थिति से रुबरु कराती है। 
सुख में न करना गुरुर कभी, 
दुःख में हौसला रखना सिखाती है।। 

माना जिंदगी मुश्किलों का समुंदर  है। 
किसको पता कैसा तेरा मुकद्दर है। 
न समझो तो मूरझे फूल हैं, 
समझो तो गुलदस्ते-सा सुन्दर है।। 

नदी चट्टानों से ज्यों न घबराती,
डंटकर मुकाबला करती है। 
जिंदगी उसी की खुशहाल रहती, 
धूप-छाया में भी जो हरपल, 
मुस्कान बरकरार करती है।। 
                          
--------------------
 *वाक्यार्थोपमा* *अलंकार* *का प्रयोग* -
---------------------
1. ज्यों अंधियारी निशा के बाद, 
होता है सूरज के साथ सुप्रभात।
 
2. ज्यों टिमटिमाते रात के जुगनू,
राहगीर को मंजिल तक पहुँचाती है।

3. नदी चट्टानों से ज्यों न घबराती,
डंटकर मुकाबला करती है। 
 

No comments:

Post a Comment

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...