Saturday, September 19, 2020

अनुरमा शुक्ला की रचना- सड़क

रचनाकार- अनुरमा शुक्ला
स्थान- दुर्ग (छ.ग.)
विधा - मुक्त
शीर्षक- 
           *सड़क*


ले जाती हैं, लाती है
कभी मंजिल तक 
पहुंचाती है,
स्वयं अपने जख्मों से
दूसरों के चोट 
बयां करती है।

दबी है काले कोलतार नीचे
 काले धन की निशानी
बारिश के तेज थपेड़े से
ऊखड़ती ये सड़कें
कहती ठेकेदारों की
भ्रष्टाचार बेजुबानी, जो
कमजोर इसे बनाकर 
स्वयं मजबूत हो चले ।

कितने आये,कितने गये
कुछ उदास, तन्हा से
ठोकर खाये हुये, तो
कुछ जीवन से भरपूर
नई उम्मीद पाले हुये,
कुछ मनचले आवारा
से मुसाफिर, चले 
नशे में चूर हुये ।

कितनों ने प्राण त्यागे
देखा इसने तड़पते,
इन स्थिर दरख्तों 
और सड़को में,
छिपी है कितनी कहानियाँ
कहती रातों की वीरानियाँ, 
ये स्थिर सड़कें संयमित, तो क्यू चलायमान असंयमित ?

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