०१. रचनाकार :- देवयानी शुक्ला
०२. जिला/राज्य :- रायपुर (छत्तीसगढ़)
०३. शीर्षक :- ऊब-चूब
०४. विधा :- मुक्त छंद
(वाक्यार्थोपमा अलंकार )
०५.दिनांक :- 16/09/2020
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-----ऊब-चूब-----
जैसे जलता है एक दीपक
अंधियारे से लड़ने को
तुम सूरज बनकर आ जाना
जीवन का तम हरने को
तुम न हो जब पास,तो
मुझको
सृष्टि यह खाली लगती
तारों भरी अमावस जैसे
चन्दा बिन काली लगती
माधव तुम आए जीवन में
सुख के सब रंग भरने को
जैसे धरती घूम रही है
अपने अक्ष में निशिवासर
मैं भी फिरती अक्ष में लिए
छवि तुम्हारी नट नागर
सात जन्म भी कम पड़ जाएँ
श्याम के दर्शन करने को
मेरे मन की हर अभिलाषा
तुम तक आकर पूर्ण हुई
जैसे नदियों की चिरयात्रा
सागर पर संपूर्ण हुई
कृष्ण प्रेम से ऊब-चूब मैं
डूब गई भव तरने को
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अक्ष : (1)धुरी (2)नेत्र
निशिवासर : दिन-रात
ऊब-चूब : लबालब भर जाना
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वाक्यार्थोपमा अलंकार
1.जैसे जलता है एक दीपक
2.तारों भरी अमावस जैसे
3.जैसे धरती घूम रही है
4.जैसे नदियों की चिरयात्रा
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व्याख्या :
प्रस्तुत कविता में
कृष्ण और उनके प्रति प्रेम की तुलना विविध उपमानों से करते हुए
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