निवासी-रायपुर ,छत्तीसगढ़ ।
शीर्षक-"" संदेश """ ।
विधा- कविता ।
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●《●》~°|संदेश |~°《●》●
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तू राह ऐसी चल--हे! पथिक--
लौटकर ,आते वक्त,
एहसास हो, उस पथ को भी,
कि,गुजरा था,यही मुसांफिर ।
राही,जब-जब पथ से---
भटक जाता है,
तब,मंजिल पास होने पर भी,
उसे वो,ढूँढ नहीं पाता है ।
भटकाव का--
जब वो,कारण जान लेता है,
तो उसे--खुद-ब-खुद,
अपनी मंजिल का पता,मिल जाता है ।
काँटों के बीच---
सदा फूल,है मुस्कुराता,
इक फूल,जीवन को,है महकाता,
एक फूल जो--
मुर्दे का,कफ़न है,बन जाता ।
फूल और काँटे में---
रिश्ता होता है,बहुत गहरा,
जब,जीवन में---
फूलों-सी ,ताजगी हो,
तो,महक जाती है,
जीवन की,अक्सर बगियाँ,
जब,होते हैं काँटे---
शूल बन जाती है,जीवन की रतियाँ ।
फूलों-सा,महकने का,अंदाज,
जब तुम,सीख जाओगे,
कभी भी तुम---
सरहदों की सीमाओं से ,
बँधे ,नहीं रह पाओगे ।
हम इन्सानो में---
सुख-शांति तभी आएगी,
जब हम,जीने का मक़सद समझ लें,
अपनी आत्मा को,
परमात्मा की,भक्ति में--
लवलीन कर लें ।।
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दृष्टांत अलंकार--
*काँटे,मकसद,लवलीन आदि।
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