स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
शीर्षक -"मोनालिसा"(असम अलंकार)
विधा- छंदमुक्त कविता
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बचपन की सहेली
छुटपन में खेली
बातें गुड़ की भेली
है वो नई पहेली
मैं हँसी तो हँसी
मेरे दुख में रोई
संग उसके मैं
अम्बर को भी छूई
मेरी सगी साथी
स्कूल की सखी
सुंदरता में रति
दोस्ती अब भी बनी
आज भी आती
रौनक है लाती
मन मेरा चहकता
जब वो मुस्कुराती
सखि प्रिय है वही
उस जैसा कोई नहीं
मन मेरा कहता है
सदा साथ रहे यहीं
नाम न कहीं कोई
अनोखी दोस्ती हुई
आओ मिलाऊं उससे
मोनालिसा है सखि भई।
(असम अलंकार-: उस जैसा कोई नहीं,नाम न कहीं कोई।)
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