स्थान-दुर्ग (छ.ग.)
विधा-मुक्तक ,विप्सा अलंकार
शीर्षक- *देश के अन्नदाता*
देश हमारा है कृषि प्रधान, फसल उपजाता हर गाँव है,
शहर का जीवन सुविधाओं भरा,पल-पल सुख की छांव है।
देश विकास निर्भर गाँवो पर,फसल ही जीवन का आधार
गाँव-गाँव है परिवर्तन की दरकार, हो सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक सुधार।
बिना बारिश के अन्नदाता चिंतित,
हाय-हाय चहुंओर मचे,
ये कैसी मजबूरी कृषक की,कर्मठ है पर बैठे हाथ पर हाथ धरे।
उदास-उदास हर चेहरा आज,
आसमान को हैं ताकते,
कुछ ऐसी सहायता हो जो इनके
दुःख भी तार दे ।
हों ऐसी योजनाएं, जिससे ग्रामीण जीवन समृद्ध हो,
पैसों की ही सहायता नहीं, आमदनी में वृद्धि हो।
गाँवो मे शिक्षा का अलख जगाकर ,कृषि सुविधाएं बढाना होगा,
कल-कारखानें, उन्नति के नये उपाय,नौजवानों को अपनाना होगा।
पैदावार बढ़ेगी, आमदनी सुधरेगी, ग्रामीण जीवन में होगा सुधार,
खेती के साथ-साथ रोजगार होगा जीवन जीने का आधार।
सुधरेगा हर ग्रामीण का जीवन
शौचालय, जल, घर-घर में होगा,
पनिहारिन को जल लाने बाहर ना तब जाना होगा।
बच्चा-बच्चा खुशहाल होगा,पढ़कर होशियार वह बनेगा,
जब होगा गाँव विकसित तो देश का भविष्य भी उज्जवल होगा।
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विप्सा अलंकार-
बच्चा-बच्चा,घर-घर,हाय-हाय,साथ-साथ,उदास-उदास,पल-पल ,दुःख ।
😊🤗😊
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