जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
शीर्षक - " आजादी के लिए बलिदान "
विधा - छंदमुक्त कविता
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सरहद की जंग में अगर रुक जाये मेरी साँस।
भेज देना मुझे मेरी बूढ़ी माँ के पास।।
मरकर भी जिंदा रहूंगा मैं तो माँ, तेरे दिल में।
चीर निद्रा में ही है बस मेरी लाश।।
बोलना हे माँ मैंने तिरंगे का परचम लहराया है।
क्या हुआ तेरा लाल खून से,
लथपथ होकर ही तो आया है।।
देख माँ मैं तो तिरंगे ही में लिपटा हूँ।
तेरे आँचल के साये में ही तो सिमटा हूँ।।
तेरा बेटा आज दूर सफर से आया है।
नये सफर के लिए पूरा झुँड साथ लाया है।।
सपने थे बुने जो आपने,
अधूरा छोड़ के जा रहा हूँ।
बाबू जी तेरा बेटा बनने,
मैं वापस जन्म लेने आ रहा हूँ।
बहू तो न ला सका, पर बाराती लेकर आया हूँ।
मौत-ए-हमसफर के लिए अंतिम विदा लेने आया हूँ।।
लाज रखना तुम्हें अब हिन्दुस्तान का है।
कसम तुझे अनुज मेरे बलिदान का है।।
माफ करना भाई मेरे,
एक वचन देकर आया हूँ।
आ रहा मेरा भाई भी शहीद होने,
यही बोल, अंतिम गोली सीने में खाया हूँ।।
गुन्हेगार तो तेरा भी हूँ मैं बहना ।
दूर नहीं मुझे भी तुमसे रहना।
अभी तो जगा था फिर कैसे सो गया।
राखी से पहले ही तेरा भाई राख हो गया।।
भाई का हर जिम्मेदारी मैं निभाया हूँ।
कलाई पर अंतिम राखी बंधवाने आया हूँ।।
सात फेरे होने वाले थे तेरे साथ।
मांगा था खुदा से तेरा हाथ।
ढंग से तो तुझसे बात भी नहीं कर पाया हूँ।
जिस सिन्दूर से सजने वाली थी तेरी माँग
लगाने से पहले ही मिटा आया हूँ।
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