जिला----जांजगीर -चाम्पा
राज्य---छत्तीसगढ
विधा- कविता (अपन्हुतिअलंकार पर आधारित )
शीर्षक --श्रम से नाता
व्याख्या ---कवि द्वारा श्रम से श्रम करने वाले व्यक्ति के जीवन में उसका क्या प्रभाव पड़ता है श्रम से जुड़े हुए लोग अपने जीवन में कितने सफल और असफल होते हैं उसका वर्णन किया गया है ।
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श्रम से नाता
श्रम से जिनका नाता है ।
रुठा उनका विधाता है ।
श्रम गंगा में जो नहाते ।
वह अश्रु रोज बहाता है ।
श्रम तो करते हैं खूब ।
अपना भाग्य जगाने को ।
ले देकर भरता है पेट ।
कुछ भी न बचा पाता है ।
परिवार आशा में डूबे ।
निराशा में पलते ।
बच्चे खिलौने की चाह रखते ।
पेट ही खा जाता है ।
श्रम से शिक्षा होता नहीं ।
श्रम से घर नहीं बनता ।
श्रम से वस्त्र नहीं मिलते ।
ले ले जीओ नाता है ।
श्रम से बहार देखा नहीं ।
श्रम से पतझड़ ही पतझड़ ।
बसंत का नहीं रहता स्वप्न ।
रहा अधूरा रह जाता है ।
वर्तमान श्रम से नहीं ।
भविष्य दूर की बात ।
श्रम से अंधेरा ही अंधेरा ।
कभी नहीं प्रभात ।
श्रम से नहीं सम्मान ।
अपमान अनादर ढ़ेर ।
भाग्य का कभी उदय नहीं।
दुर्भाग्य ही दुर्भाग्य अंधेर ।
हंसी तो कल्पना है ।
कल्पना में भी हंस लेते ।
हर हकीकत कोसों दूर ।
क्या करें ऐसी रह लेते ।
जूझते श्रम से अव्यवस्था में ।
व्यवस्था पाने के लिए ।
रटते -रटते जीवन निकलता ।
कोई नहीं बचाने के लिए ।
श्रम से मिलता है पुरुस्कार ।
वह भी कागज का टुकड़ा ।
श्रम की जय होती है ।
श्रमिक जीवन उजड़ा उजड़ा ।
गिरधारी लाल चौहान
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