विषय - *जीवन के पड़ाव
शीर्षक :- जीवन के पड़ाव
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*जीवन के पड़ाव*
जिंदगी लंबा सफर है,
पड़ाव उसका श्रृंगार,
साँसों का आना-जाना,
बहाव नही उसका आकार।
जीते जी चलते जाना
ठहराव है बेकार,
जीवन के पड़ाव कहाँ?
कैसे सपने को करे साकार।
जिंदगी कल-कल करती
नदी सी प्रवाह,
भूत-भविष्य की चिंता में
बन बहती बहाव।
वर्तमान से रहता
अक्सर वो वेपरवाह,
लाभ-हानि,यश-अपयश पर
झूलते रहने का स्वभाव।
कभी जीवन व्यापार
बन छटपटाता है,
बचपन का पड़ाव
बहुत याद आता है।
यौवन का उन्माद
रस यौवन छलकाता है,
बुढापा ढलती छाया बन
विश्राम बन रूक जाता है।
जिंदगी कभी आहों,
कभी चाहों में पलता है,
छाले पड़े चाहे पाँवों में
फिर भी चलता है।
जिंदगी खुशनुमा सफर
बन हर पल चलता है,
जो समय की कद्र नही करता
वो हाथ मलता है।
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,कांकेर,(छ.ग.)
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