स्थान- दुर्ग (छ.ग.)
विधा- मुक्तक
शीर्षक- *बीते हुए लम्हें*
स्मृतियाँ होती हैं विशेष,
बीते हुए उन लम्हों की,
जो गुज़ारे अपनों के संग,
कुछ दादी,नानी के किस्से,
उनकी प्यार भरी नसीहतें,
जिन्होंने सिखाया सदाचार,
माँ की गोद,पिता का साया,
खिलखिलाता बेफिक्र बचपन,
सहपाठियों का साथ और
गुदगुदाने वाली मौज-मस्ती।
खोलते हैं जब यादों की गठरी,
कुछ अफसोस भी होता है ,
अपने ही किये निर्णय पर,
दौर बदलता रहता है हमेशा,
और हम सामंजस्य करते हैं,
पुरानी रूढ़िवादी परंपरायें,
और नयी आधुनिकतायें,
आत्मकुंठित रहते सबके बीच,
समय चलते रहता निरन्तर ,
कितनी यादें देकर,तस्वीरों में
हृदयपटल में सहेजे हुये ,
वो गुज़रे हुये अनमोल पल।
धीरे-धीरे बढ़ते जायेंगे पन्ने इतिहास के, और
हम भी कभी यादें बनकर ही तो रह जायेंगे ।।
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