Saturday, August 8, 2020

दुर्ग से अनुरमा शुक्ला की रचना- जीवन की दोपहर

रचनाकार- अनुरमा शुक्ला
स्थान- दुर्ग (छ.ग.)
विधा-मुक्तक ,श्लष वक्रोक्ति अलंकार

शीर्षक - *जीवन का दोपहर*



कौन, पसंद नहीं करता,
सुनहरी भोर 
हाँ,ना जीवन की अलसुबह
माँ का आँचल
पिता की ऊँगली का सहारा
हौल-हौले गुजर ही गया।

पकाया दोपहर की चिलचिलाती धूप ने जब
जिम्मेदारियों ने बाँह पकड़ा,
सहते रहे थपेंड़े जीवन के लम्बे थे ना दिन,
यहीं पर ठहर गई उम्र ना जवानी
ना बुढ़ापा,
बालों की सफेदी साँझ का दस्तक बताते रही,
दोपहर भी गुजर जाने का पैगाम देने लगी।

अब तु डोरे डाल ना मुझ पर
          ऐ मेरे जीवन की संध्या,
मुझे रहने दे ना अब 
           इस तपिश के साथ,
जाना है ना छोड़कर ,
        तुम रोक लो ना जाने दो,
भाते हैं मुझे ये झंझावत,आदत  
    नहीं अब  ठंडे ऊनी लिबास के,
सुखभरे एहसास के सुकून भरे   
           सुबह और साँझ की ।  
                                      
मेरे सिर पर तेज धूप का आँचल रहने दो ना,
जीवन की दोपहर में ही मुझे    
जीने दो ना ।।

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श्लेष वक्रोक्ति अलंकार

लम्बे थे ना दिन,डाल ना मुझ पर,रहने दे ना अब,जाना है ना छोड़कर, रोक लो ना जाने दो,आँचल रहने दो ना,जीने दो ना ।

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