Friday, August 28, 2020

रायगढ़ से उर्मिला सिदार की रचना- श्रम और सेवा

रचनाकार- उर्मिला सिदार 
ग्राम -बुलाँकी 
जिला -रायगढ़ (छत्तीसगढ़ )
विधा -कविता 
शीर्षक -"श्रम और सेवा"
 
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       *श्रम और सेवा*

सेवा और श्रम दोनों ,
जीने का है मूल अधार।

 श्रम से समृद्धि हो जिए,
 सेवा से पाये सत्कार।

 समृद्धि से परिवार में शांति,
 सेवा से मिलते खुशियाली ।

घर परिवार सुख शांति रहे ,
जैसे खेतों की हरियाली ।

जो मानव श्रम ना करे ,
जिंदगी मे चोर कहाय ।


बिना श्रम किए अमर बेली जैसे,
 बैठे चूस चूस खाए।

जो मानव सेवा ना जाने, 
वह सम्मान से वंचित रह जाए।

 उसे सत्कार कहाँं मिले,
 व्यर्थ जिंदगी गवाय ।

 मनमानी जिंदगी जी के,
 समाज में कलंक कहाय।

 कलुषित जिंदगी जी के ,
अकारथ जिंदगी गवाँय।

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 व्याख्याः- इस कविता में श्रम और सेवा की गुण और अवगुण दोनों को व्यक्त किया गया है।
अपह्नुति अलंकार- सुख शांति से हरियाली
 बिना श्रम -अमरवेली
 कलंक -अकारथ

 उर्मिला सिदार रायगढ़ छत्तीसगढ़

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