ग्राम -बुलाँकी
जिला -रायगढ़ (छत्तीसगढ़ )
विधा -कविता
शीर्षक -"श्रम और सेवा"
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*श्रम और सेवा*
सेवा और श्रम दोनों ,
जीने का है मूल अधार।
श्रम से समृद्धि हो जिए,
सेवा से पाये सत्कार।
समृद्धि से परिवार में शांति,
सेवा से मिलते खुशियाली ।
घर परिवार सुख शांति रहे ,
जैसे खेतों की हरियाली ।
जो मानव श्रम ना करे ,
जिंदगी मे चोर कहाय ।
बिना श्रम किए अमर बेली जैसे,
बैठे चूस चूस खाए।
जो मानव सेवा ना जाने,
वह सम्मान से वंचित रह जाए।
उसे सत्कार कहाँं मिले,
व्यर्थ जिंदगी गवाय ।
मनमानी जिंदगी जी के,
समाज में कलंक कहाय।
कलुषित जिंदगी जी के ,
अकारथ जिंदगी गवाँय।
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व्याख्याः- इस कविता में श्रम और सेवा की गुण और अवगुण दोनों को व्यक्त किया गया है।
अपह्नुति अलंकार- सुख शांति से हरियाली
बिना श्रम -अमरवेली
कलंक -अकारथ
उर्मिला सिदार रायगढ़ छत्तीसगढ़
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