02. जिला :- रायपुर (छत्तीसगढ़)
03. छंद :- मुक्तक
04. रचना का शीर्षक :- *अवध पुरी*
हे राम ! तुम्हारे *भाग* में
लिखा था फिर वनवास ।
आधी सदी के बाद में
अब आया मधुमास। (1)
*हरि* को शीश नवाइए ,
मिटेंगे सब संताप ।
*हरि* बिना अपूर्ण हैं
निशा , दिवस , हरि आप । (2)
सरयू के तट पर बसा ,
पावन कौशल धाम ।
राम नाम से ही मिले ,
*निष्कामों को दाम* । (3)
कितनी *भारी* थी अहो!
*राम लला की बाट* ।
एक ओर विश्वास था ,
एक छोर सम्राट । (4)
आस्था निष्कंटक हुई ,
मन पाए विश्राम ।
अभय भक्ति को है मिला ,
*अवध पुरी है नाम* । (5)
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श्लेष अलंकार
(1) *भाग* - भाग्य और हिस्सा
(2) *हरि* -ईश्वर , चंद्रमा , सूर्य , हनुमान
चंद्रमा बिना रात ,सूर्य बिना दिन , हनुमान बिना राम अपूर्ण हैं ।
(3) *निष्काम* - साधू , बेरोजगार
*दाम* - महत्व ,काम का दाम
(राम मंदिर निर्माण से
रोजगार के अवसर मिलेंगे और तीर्थ में साधुओं को सम्मान मिलेगा ।)
(4) *राम लला की बाट* -
*राम लला को तौलने वाला बट्टा बहुत भारी है , क्योंकि वे अतुल हैं ।
*राम लला की प्रतीक्षा अत्यंत भारी यानि कठिन थी ।
(5) *अवधपुरी* -
* राम की अयोध्या पुरी ।
* ऐसी पुरी , जहाँ वध न हो ।
( राम राज में आस्था और भक्ति निर्भय होंगी अब इस अवध पुरी में किसी की भावनाओं का वध नहीं होगा । )
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Waah Bahut khoob जय जय श्री राम
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