रायगढ़, छत्तीसगढ़
विषय -थलाकृति (रूपक अलंकार)
विधा-मुक्त छंद कविता
शीर्षक- धरा को खुशियों से भर दो
हम पृथ्वी में रचे-बसे या
पृथ्वी हमपर रची-बसी?
हम जैसे सुख -दुख सहते
पृथ्वी से ही सीखी हमने
सहना और सहते जाना।
इसकी ना कोई परिभाषा
सर्वत्र फैला इसकी आभा
पर्वतों की छटा निराली है
कल-कल करती नदियां
कहीं शांत स्वरूपा माँ सी
तो कहीं अल्हड़ सी कुमारी है।
द्वीपों महाद्वीपों तक फैला
पृथ्वी की ना कोई छोर है
गहराई को नापता सागर
ही शांत फैला चहुँ ओर है
देशो और उनमें बसे लोगों के
कोलाहल से गुंजायमान है।
इसकी स्थलाकृतियों की शोभा
सर्वत्र व्याप्त एक समान हैं
सदैव परिक्रमा में व्यस्त रहती
पर रखती माँ सी ख्याल है
पृथ्वी ने देना ही सीखा पर
मनुष्य उससे करता खिलवाड़ है
आज त्राहि-त्राहि मची सब ओर
यह उसका ही परिणाम है
आज वसुंधरा तुझसे करबद्ध
प्रार्थना है यही हम सबकी
भूल हमारी नादानी को फिर
धरा को खुशियों से हरा कर दो।
👌
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