स्थान-----नवापाराखुर्द/सक्ती
जिला----जांजगीर -चाम्पा
राज्य---छत्तीसगढ
विधा---छंद मुक्त कविता(अनन्वय अलंकार पर आधारित)
शीर्षक --अपना गांव सुख का छांव
व्याख्या ---कवि के द्वारा अपने गांव ही सब कुछ है कहकर स्वदेश स्वमिट्टी स्ववस्तु स्वविचार पर चलने एवं जीवन जीने पर बल दिया गया है जिससे शोषण अत्याचार का अंत हो निरर्थक पलायन वादी जो ताकतें हैं उनका अंत हो ।
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अपना गांव सुख का छांव
गांव में खाना गांव में कमाना ,सपना भी हो गांव का ।
गांव की नदी किनारा, जरुरत क्यों विदेशी नाव का ।
गांव में हम पले बढ़े,सब कुछ उसको मान चले ।
देखा देखी अनुसरण से, कुछ भी फूले न फले ।
हाथों से जो बन रहा ,कीमत समझो उस छांव का ।
उसी छांव का किराया, कोई दूसरा कमा लेता है ।
हमारे पीछे एक रुपया लगा, सौ बना लेता है ।
अपने पांव मजबूत रखें,न सहारा लें दुसरे पांव का ।
कोलगेट का विज्ञापन आता, तरह तरह का फायदा गिनाता ।
देशी विदेशी कंपनियों का लिस्ट रहता,जो मुझको एक न सुहाता ।
किसी के पास सलाह नहीं है, मुफ्त में मिलता अपने दातौन का ।
हर वस्तु में कुछ न कुछ भेद छिपा है, हर वस्तु हमें लूट रहा ।
खाने से लेकर पहनने तक, जिससे सब का कमर टूट रहा ।
वस्तु चाहे जैसे भी हो सब तुलना ,करते रहते अपने भाव का ।
जनता समझ नहीं पा रही ,उसका ही हरदम गुन गा रही ।
अपना साधन सुख का साधन, विचारों में नहींआ रही ।
जो बिखरे हैं गुलामी के तीर हैं, प्रयोग करो अपने प्रभाव का ।
अपना धन कोई दूसरा खाये, ये कैसी जागरूकता हैं ।
अपना घर कोई दूसरा बसे ,ये कैसी आधुनिकता है ।
परिचय और परिवर्तन जरुरी, है अपने स्वभाव का ।
गिरधारी लाल चौहान
Bahut sunder
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