जिला-कांकेर,छग
शीर्षक- गणपति देवा
विधा-कविता,(मुक्त छंद)
गणपति देवा ,विघ्न विनाशक
मेरे घर में विराजो भगवान।।
सबकी बिगड़ी बनाई तुमने,
मेरी भी तो सुन जाओ ना।।
बुद्धी प्रदाता,मूषक सवारी,
मां पार्वती के आंखों के तारे।
श्री गणेश होता शुभ कार्यों का,
अंधे को आंख देते,सुख प्रदाता।
दुखियों के दुःख हर्ता गजानन,
करदे सबके घर को अब पावन।।
*मीरा आर्ची चौहान*
*कांकेर, छग*
_________________________
No comments:
Post a Comment