स्थान-दुर्ग (छ.ग.)
विधा- मुक्त छंद
शीर्षक-
*अधूरी ख्वाहिशें*
जिंदगी के अंतिम पड़ाव तक,
ख्वाहिशें मन में जागती हैं ।
ये सतरंगी सपने ही तो,
जीवन में नये रंग भरते हैं।
कुछ ख्वाहिशें पालना जरूरी है,
मुकम्मल करने की कोशिशें भी।
एक जुनून मन में जगाना होता है,
यही संघर्ष का जज़्बा स्फूर्ति देता है।
मन में पल रही खुशनुमा ख्वाहिशें
जीवन का आधार बन जाती हैं।
और
निर्रथक लगती है ये आदर्श बातें,
जब लाख कोशिशें हों नाकामयाब
।
हम किस्मत का लिखा बदल नहीं पाते,
वक्त के हाथों ही छलते चले जाते ।
और यही अधूरी ख्वाहिशें हमें,
पल-पल तड़पाती है तरसाती है।
कौन जी पाया है मनमुताबिक,
पूरी कर पाया अपनी हर ख्वाहिश?
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