रचनाकार श्रीमती रजनी शर्मा बस्तरिया
जिला रायपुर छत्तीसगढ़
शीर्षक " चिक्खल "
.विधा .... मुक्तछंद .....................
चिक्खल
...................................,....
बांस की केंवरी फांकें,
और सरई पान की जुगलबंदी।
छतोड़ी संग पानी की झड़ी,
सब राग मल्हार गाते हैं ।
मीलों तक फैले खेतों में,
जब थरहा टांका जाता है ।
जोंक चाहे चूस ले लहू,
कीचड़ में धंसे जीवट पैर।
मुरूम के रंगों से सराबोर,
रोप ही देते हैं हरियाली।
कतार से पौधे.......
बेरा होते ही,
हंस देते हैं जूड़ी के जूड़ी।
लहलहा उठते हैं थरहा,
और चिक्खल लगा कर।
तिहार के बहाने,
माटी...माटी हो जाते हैं।।
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