Monday, July 20, 2020

महासमुन्द से सुन्दर लाल डडसेना"मधुर" जी की कविता:- प्रिये! तुम्हारा ये इंकार

कवि- सुन्दर लाल डडसेना"मधुर"
जिला- महासमुन्द(छत्तीसगढ़)
शीर्षक- प्रिये! तुम्हारा ये इंकार

प्रिये!तुम जीवन का राग बनाओ।
चाहे खुशियों का बाग लगाओ।
गर तुम वैराग्य का आग लगाओ।
या जीवन को अपना सौभाग्य बनाओ।
      मैं जीवन का गीत गाता हूँ।
      तुम जमाने का रीत बताते हो।
      तुम मुझे एक बार मीत बुलाते हो।
      परोपकार सर्वोहित दोहराते हो।
तुम जीवन के बंधन से मुक्ति दिलाते हो।
मैं ययावर हूँ, तुम्हारा प्रीत फैलाता हूँ।
उस प्रीत को दुनिया को दिखलाता हूँ।
रहो तुम हमेशा खुश,यही राग दोहराता हूँ।
बंधन मुक्ति की बात बतलाता हूँ।
ययावर हूँ मैं साथी,हमेशा प्रीत फैलाता रहूँ।
      मन मंदिर जो गूँज रहा है।
      प्रीत,मीत व जीत के झंकार से।
      ढेरों दुआएँ देती हैं जो हरदम।
      क्यों टूट जाता है,एक इंकार से।

*सुन्दर लाल डडसेना"मधुर"*
ग्राम-बाराडोली(बालसमुंद),पो.-पाटसेन्द्री
तह.-सरायपाली,जिला-महासमुंद(छ. ग.)
मोब.- 8103535652
          9644035652
ईमेल- sldmadhur13@gmail.com

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