जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-कोरोना और बेरोजगारी
विधा-कविता (मुक्त छंद)
महामारी कोरोना का डर
बेरोजगारी का कहर,
लाचार है आदमी,
कैसे करें गुजर-बसर।
बुजुर्गो की लाठी,
पत्नी की बीमारी,
बच्चों की फीस,
कैसे मिटे ये टीस।
कभी दाल है तो
आटा नहीं और
चांवल है भी तो
सब्जी -भाजी नहीं।
कहां से लाएं पैसे
करोंना के डर से
कहीं कोई काम नहीं,
उधार कोई देता नहीं।
भाग्य विधाता के
भरोसे जिंदा हैं,
करोना का डर है
मानव एक परिंदा है।
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर,छग
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