जिला :- महासमुंद
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक :- कलाम को सलाम।
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शुमार है रत्नों की पंक्ति में,
मां भारती का ओजस्वी पूत।
दिया गर्व व मान माता को,
सदा अमर वह सच्चा सपूत।
कहा कहीं कभी उन्होंने,
सपने नहीं वे जो सोकर देखें।
सच्चे सपने संसार में वहीं,
जो हमें कभी सोने ना देते।
कभी कहा ना बदल सके हैं,
भले भविष्य को हम अपने।
पर बदल कर निज के आदत को,
बदले भविष्य, साकार हो सपने।
थे वैज्ञानिक, मिसाइल मेन वे,
राष्ट्रपति के पद पर आसीन हुए।
सरल सहज स्वाभाव से अपने,
हर हृदय के तार छुए।
हो गए अमर, अमर उनकी गाथा,
राष्ट्र को जग में नाम दिया।
देते उद्बोधन विद्यार्थियों को,
जीवन के सफर को थाम लिया।
आज भी कईयों के सपने में,
चाहत बने वे भी कलाम।
करता जिस आदर्श पुरुष को,
पूर देश शीश झुका सलाम।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने भारत रत्न के योगदान व उनके विचारों पर प्रकाश डालने का एक छोटा प्रयास किया है।
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