स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कविता { छत्तीसगढ़ी भाखा म }
शीर्षक--' सावन के अलकरहा बादर '
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आगे सावन छागे बादर ।
चारों मुड़ा म भरगे बादर ।।
चमचम चमके बिजली रानी ,
चमक आँखी म मारै बादर ।
गिरगे बिजली लकठा म सहीं ,
ऐसन कड़कत रहिथे बादर ।।१।।
आँखी - कान चौंधिया जाथे ,
थर्रा देथे गरजय बादर ।
चोला ल हे खूब डरवाथे ,
घहर - घहर घहरावै बादर ।।२।।
सूपा कस धार गिरै पानी ,
डोली-खेत ल भरदिस बादर ।
औंराही बूँदी कस बरसे ,
झड़ी लगादिस देखव बादर ।।३।।
तरिया - नरवा - सागर भरगे ,
पानी - पानी करदिस बादर ।
गरीबहा के चूहै छानी ,
घर म चिखला मताये बादर ।।४।।
पानी छींचत राति पहावै ,
नींद ल घला बिगाड़ै बादर ।
गोदरी - पिछौरी ल भिंजाथे ,
अति अलकरहा हावै बादर ।।५।।
सहर-नगर म हे घुसे पानी ,
गझवा दिस करलाई बादर ।
मोटर - गाड़ी 'ठाकुर' तौंरे ,
कतको जिनगी खागे बादर ।।६।।
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व्याख्या--बादर के अति बरसे के खराब परभाव के
सम्बन्ध म परकास डारे के परयास करे
हँव । अच्छा परभाव ल छोड़ देहे हँव ।
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