कवियित्री चंदा प्रहलादका
कलकत्ता
शीर्षक -मानवता
बाज़ारों में आज भी लगती , क़ीमत एक इंसान की,
कहीं बिकता ईमान यहाँ तो कहीं बिके अरमान भी।
घायल होंठों की तड़पन ,
सब जाने , पहचान नहीं,
रोटी कपड़े की ख़ातिर,
क्यों पाता है सम्मान नहीं ।
मानवता की बात ही करते, कर्मों का लेखा जोखा,
सच से धोखा खाया ,सच से रहे सदा अंजान ही ।
कहीं बिकता ईमान यहाँ तो कहीं बिके अरमान भी।
जन्म लेती पर्दे के पीछे,
जाने कितनी कहानियाँ ।
अफ़सोस मगर होता उसका,
है एक दुखद अंजाम भी।
क़िस्से तो गढ़ लेते कितने ,तोहमत ख़ूब लगा देते,
मानवता को भूल अंह में, कर देते अपमान भी।
कहीं बिकता ईमान यहाँ तो कहीं बिके अरमान भी ।
हाले दिल की ज़ुबां बनी ,
नैनों की भाषा पढ़ लें तो ।
हमराही हमकदम बने तो ,
जीवन एक वरदान भी ।
सुख दुख बाँटे दर्द से उबरे ,मानवता का पाठ गुने,
हँसी-ख़ुशी से जीत लें फिर से धरती का संग्राम भी।
कहीं बिकता ईमान यहाँ तो कहीं बिके अरमान भी ।
स्वरचित एवं मौलिक रचना
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