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कवि-- डॉ एन के सेठी
पता-..बाँदीकुई(दौसा)राज.
शीर्षक- *हरीतिमा से आच्छादित है*
विधा-सार छन्द
हरीतिमा से आच्छादित है,धरती का हर कोना।
कुदरत के अंगों के आगे, व्यर्थ लगे अब सोना।।
सावन में बारिश की बूँदे, मन को लगती प्यारी।
धरती भी लगती है अब तो, सुंदर से फुलवारी।।
घन हैं घिरे घनघोर गर्जन, हो रहा आसमां में।
चहुँ ओर से धरती सजी है,होयशांति आत्मा में।।
मेढक अभी टर्रा रहे हैं, झींगुर शोर मचाते।
मदमस्त होकर अब मयूरा,सबको नृत्य दिखाते।।
भरे हुए हैं ताल तलैया, सावन की ऋतु न्यारी।
भरे नीर से अम्बुद नभ में, गिरने की तैयारी।।
नभ में चमचम बिजली चमके,करेजगतउजियारा।
कनक रेख सी चमके बिजली,चमके ये जग सारा।।
वल्लरियाँ हैं तरु आलिंगित,शीश वृक्ष चढ़ जाती।
चञ्चल चपला खूब डराए, कामिनियाँ इतराती।।
झूमे वृक्ष गगन को चूमे, तेज चले पुरवाई।
यह मास पावन रुत है बड़ी,सबके मन को भाई।।
सभी मनुज इस पावन रुत में,करें शम्भु की पूजा।
इस दुनियां में शिव के जैसा, ओर न कोई दूजा।।
शिव के जयकारे जब गूँजे, भव त्रास मिट जाए।
इस पुण्य पावन मास में सब,भक्ति सरिता बहाए।।
©डॉ एन के सेठी
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