कवयित्री: डॉ बी निर्मला
जिला: मैसूर,
राज्य: कर्नाटक,
शीर्षक: बेटी
कविता : बेटी
जैसे बागों में खिलते हैं फूल,
सुंदर,कोमल कलियों से,
वैसे हर घर का आंगन महके,
चंचल व लाडली बेटियों से।
शीतल जैसे चंदा की चांदनी,
बेटी होती हैं, घर की रोशनी,
कभी न समझो उसे कमजोर,
संभाले परिवार की बागडोर।
बचपन से मरते दम करती
निरत अपना,कर्तव्य निभाती,
कभी न कोई शिकायत करती
फ़र्ज़ बड़े फक्र से पूरा करती।
कोई काम न उससे अछूता,
छोड़े न कोई काम वह अधूरा,
बेटी किसी से कम नहीं होती,
धरती क्या,अंबर भी छू लेती।
कोई भी काम दे दो उसे जरा,
फिर देखो तुम उसके अंदाज़,
चलाती ना केवल घर,परिवार,
अंबर में उड़ाती हवाई जहाज
रसोई,घर,दुकान,दफ्तर,हो चाहे खेती,
सब जगह झटपट वह काम कर दिखाए,
पढ़ाई,खेलकूद,नौकरी और युद्धभूमि,
हर क्षेत्र मेंआगे यह है उसकी खूबी।
नहीं समझो बेटी को अबला,
बनाओ उसे तुम सदा सबला,
छोटी सी इच्छा कर दो जरा तुम पूरी,
बखूबी निभाए वह सारी जिम्मेदारी।
मांगे ना किसी से वह कुछ, मांगे जीवन,जीने का हक,
सताओ,जलाओ,मारो न उसे,
शक्ति वह,नहीं कम किसी से।
देकर देखो उसे छोटा,बड़ा, सरल,जटिल,
बड़े,साहस,धैर्य,संयम,नियम होकर अटल,
कोई भी काम,पूर्ण कर,रोशन कर देगी,
वह,अपना,अपने परिवार, देश का नाम।
अब उसके इरादे नेक और पक्के,
न झिझकती,घबराती,पीछे न हटती,
हाथों में,बेलन,कलम ही नहीं लेती,
वतन की खातिर वह बंदूक भी उठाती।
बहुत नाज़ुक देखने में बेटी, बहुत दम उसमें,
अर्थी को कंधा,चिता को अग्नि खुद देती।
'बेटी पढ़ाओ,बेटी बचाओ' नारा पढ़ा,सुना,
जागो बेटी के,प्रति फ़र्ज़ निभाओ ना।
रक्षा करें,अत्याचार,भ्रूणहत्या, दहेज से,
वंश,घर,परिवार,देश का मान बेटी ही से।
बेटी जीवन में,निभाए हर भूमिका बखूबी,
परिवार में है वह सरस्वती, दुर्गा,लक्ष्मी।
करें न कभी,किसी बेटी का कोई अपमान,
उसकी चंद सांसों को भी दे मान,सम्मान,
बोझ समझने की भूल कभी ना करें क्योंकि,
बेटी घर की मान है,बेटी घर की शान है।
रचियता:
डॉ.बी.निर्मला,
एसोसिएट प्रोफेसर(रिटायर्ड)
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