जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
विधा - हाइकु
शीर्षक - " दहेज प्रथा "
ब्याख्या - रचनाकार ने साहित्य की हाइकु विधा के नियमावली में शब्दों को पिरोते हुए, दहेज के कारण महिलाओं को जलाये जाने का वर्णन किया है।
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1. फूल-सी कलि
खुशियों में ही पली
आग में जली।
2. पाला था जिसे,
परियों की तरह
दूर हो चली।
3. नाज थी मेरा
आँखों की तारा थी ओ
क्यों चढ़ी बलि।
4. सात फेरे ओ
अग्नि के तुने लिए
फिर क्यों गलि।
5. कैसा निर्दयी
पत्थर का दिल है
तेल में तली।
6. धन भी दिया
पगड़ी भी अर्पण
स्कूटी भी चली।
7. फिर भी भूखे
लालच में आकर
मौत उढ़ेली।
8. जिस्म जलाई
सपने भी जलाया
नादान कलि।
9. कब तक ये
मौत-ए-मंजर सा
खून की नली।
10. दहेज श्राप
कलंक समाज का
सदियों चली।
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Nice ji��
ReplyDeleteWah
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