Friday, July 24, 2020

कर्नाटक से डॉ बी.निर्मला"राजी" की कविता:-एक शाम वतन के नाम

नाम : डॉ बी. निर्मला "राजी"
राज्य: कर्नाटक
शीर्षक: एक शाम वतन के नाम 
              
             कविता

   "एक शाम वतन के नाम"

आइए,परिचय कराऊं मैंअपने प्यारे वतन की,
प्रेम करो इस वतन से,यह भूमि है शहीदों की,
मुझे गर्व इस पर,नाम है इसका भारतवर्ष,
इस वतन की माटी से करूं मैं रोज तिलक।

उत्तर में शान से,ताज पहने खड़ा हिमालय,
दक्षिण में चरणों को धोए हिंद महासागर,
पश्चिम में फैला विशाल थार का रेगिस्तान, 
पूरब में दूर दूर तक हरे भरे चाय के बागान।

' सोने की चिड़िया' नाम से प्रसिद्ध विश्व में,
भरे हुए हैं,बहुमूल्य रत्न इसके गर्भ में,
सुनहरे पन्नों से भरा मेरे वतन का इतिहास,
जहां देते वीर वतन हेतु  अपना बलिदान।

ऋषि मुनियों,महापुरुषों ने लिया जन्म यहां,
अपार ज्ञान,संस्कृति का भंडार है यहां,  
सारे विश्व को ज्ञान का पहला पाठ पढ़ाया,
विश्व का प्रथम गुरु भी मेरा वतन कहलाया।

अर्थशास्त्र,राजनीति,ज्योतिष,और विज्ञान,
गणित,कला,संगीत,योग का गुरु मेरा वतन,
संस्कृति,सभ्यता की अपार है धरोहर जहां,
आध्यात्म,शांति के लिए आते  लोग यहां।

गुणवान,प्रतिभावान,मेहनती व स्वाभिमानी,
सदा आगे बढ़ते मेरे वतन के अभिमानी,
वीर सैनिक खाते गोली सीना तान के,
बच्चे,युवा,स्त्रियां भी कम नहीं किसी से।

वतन की खातिर वीर करें सब कुछ कुर्बान,
हैं ये मेरे वतन की आन,बान और शान।
क्या क्या बखान करूं मैं अपने वतन की?
छोटी सी कविता रूप लेलेगी महाकाव्य की।

रचियता,

डॉ.बी.निर्मला,
एसोसिएट प्रोफेसर,(रि.),
मैसूर,कर्नाटक

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