कवि डॉ मनोज श्रीवास्तव
गोमती नगर लखनऊ उत्तर प्रदेश
शीर्षक-उन अज्ञानियों को समर्पित जिन्हें अपने अस्तित्व का पता नहीं
*
तुम क्या हो और कहां से हो अपना अस्तित्व जानते हो
क्यों तर्क कुतर्क कर रहे हो जिसका है तुमको भान नहीं
,*
आतंकी क्रूर लुटेरों ने कितने ही साक्ष्य मिटा डाले
नालंदा तक्षशिला दोनों की गौरवगाथा ज्ञान नहीं
*
अपनी ही 7 पीढ़ियों के तुम नाम नहीं बतला सकते
खुद को चाहे जो भी समझो तुम हो सकते विद्वान नहीं
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सतयुग त्रेता द्वापर कलयुग हैं चारों युग इस दुनिया के
तुम ठहरे भीम मीम वाले हो सकता तुमको ज्ञान नहीं
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पहले जाकर अपने पुरखों के सारे नाम जुटा लो तुम
भगवान राम का नाम है क्या हो सकता तुमको भान नहीं
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