स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- आलेख
शीर्षक -"करुण सत्य"
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जन्म भूमि और जन्म देने वाली मां से बढ़कर हमारे लिए दुनिया जहान में कोई नहीं इसलिए कहा भी गया है -"जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी"।
जन्मभूमि से ,जननी और जननी है तो हम हैं ।इसलिए जन्मभूमि जननी से भी महान कहूं तो कोई अतिश्योक्ति ना होगी ,क्योंकि अपने कोख में 9 महीने रखने वाली सारे कष्ट सहकर जन्म देने वाली मां भी अपने कलेजे के टुकड़े को जन्म भूमि की रक्षा में हंसते-हंसते त्याग कर देती है उसे अपने जिगर के लाल को देश की रक्षा के लिए सौपते वक्त तनिक भी अफसोस नहीं होता और गर्व से कहती है तूने मेरे बेटे मेरे दूध की लाज रख ली।
एक पिता बेटे की अर्थी को कंधा देकर रोता नहीं है। उसका सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है ,उसके आंसू नहीं गिरते बल्कि वह कहता है कि काश मेरा एक और बेटा होता तो मैं उसे भी देश की सेवा में लगा सकता।
पत्नी बच्चे सब दुखी मन से सीना फुलाए गौरवान्वित महसूस करते हैं। पर फिर भी उनकी व्यथा दुख को वही समझ पाएगा जिसके घर का बेटा एक फौजी की भांति वीरगति को प्राप्त होकर आएगा। हम चाहे कितने अवार्ड ,चक्र ,सम्मान पत्र देंदे पर उस घर का आंगन उस तमगे और चक्र से कभी ना मुस्कुराएगा ।उनकी आँखों में गौरव महसूस करते हुए भी एक खाली सूनापन और नमी लिए होगी ,क्योंकि पत्नी का वो पति ,जिसने सात जन्म साथ निभाने की कसम खाई थी ,वो अब साथ नहीं रहा । बच्चों के सर से सहारे की छत नहीं रही और बूढ़े मां बाप की बुढ़ापे की लाठी न रही।
शहीद का शव जब तिरंगे से लिपटा दहलीज पर आता है दिल तो क्या आसमा ,सारा जहान रोता है। एक क्रंदन वातावरण में चुपचाप ही गूँजती है दुश्मनों से बदला लेने मन की आकुलता बढ़ती है ।समाज साथ -साथ खड़ा होकर श्रद्धांजलि देता है ।शासन की प्रतिबद्धता पूरी होती है। दिन गुजरता है समाज की आत्मा सोने लगती है और अचानक 26 जनवरी और 15 अगस्त को क्षणिक जागकर समाज फिर चीर निद्रा में चला जाता है।
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