संबलपुर, जिला -कांकेर
विषय-यमक अलंकार का उपयोग करते हुए जीवन के उतार-चढ़ाव से संबंधित रचना
शीर्षक-जीवन के उतार-चढ़ाव
*जीवन के उतार-चढ़ाव*
जिंदगी के उतार-चढ़ाव में,
कभी धूप कभी छाया है।
कभी घटा का घटा साया,
कभी जीवन में खग्रास आया।
कभी नभ में सूरज इतराया,
ये देख धरा का सूरज घबराया।
जिंदगी का राज कोई
समझ ना पाया,
कई बार उलझन
बन उलझाया।
कभी हँसाती कभी रूलाती है,
आस और विश्वास
के बीच झुलती और
झुलाती है।
कभी खुशगवार कभी
हताशा बन आती है,
कभी बिंदास कभी
उदास कहाती है।
जिंदगी का कोई
साज समझ ना पाया,
राग-रागिनी कोई
गया ना पाया।
कल नन्हें बच्चों का कल,
कारखाना बना ठिकाना,
एक दिन जिंदगी का
बनेगा आना जाना।
जिंदगी रो-रोकर गुजारी है,
किसी ने हर पल
जिंदगी सँवारी और
गुजारी है।
कोई तो मोहताज है,
कोई बना सरताज है।
किसी की किस्मत भारी,
किस्मत की ये बात है सारी।
______________________✍🏻
व्याख्या-प्रस्तुत कविता में जीवन में आने वाले उतार और चढ़ाव जिसमें कभी खुशी,कभी दुख,कभी उदास,कभी हताश आदि बातों का वर्णन किया गया है।
यमक अलंकार का प्रयोग
1घटा
घटा-बादल
घटा-कम होना
2.सूरज
सूरज-एक नक्षत्र
सूरज-एक नाम
3.कल
कल-आने वाला भविष्य
कल-मशीन
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, कांकेर,( छ. ग.)
No comments:
Post a Comment