जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-जीवन के दस्तुर
विधा-कविता,( मुक्त छंद-यमक अलंकार)
मानव जीवन के इस बगिया को,
रातरानी -सा महकते देखा है।
पल- पल बदलते मौसम यहां,
पल में सूरज को ढलते देखा है।
कल कल के किस्से पुराने हुए,
बसते शहर को उजड़ते देखा है।
हल हल से जीवन जीना दुश्वार,
पल- पल में परिंदे उड़ते देखा है।
लड़खड़ाता रह गया सूना आंगन,
बूढ़े बरगद को उखड़ते देखा है।।
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर, छग
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पल-समय,क्षण
हल-निदान,खेत जोतने का औजार।
कल-मशीन,आने वाला समय।
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