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रचनाकार -- प्रवीण कुमार ठाकुर
जिला -- राजनांदगाँव (छ.ग.)
शीर्षक -- पावस
विधा -- चौपाई छंद
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।।१।।
पावस के आते ही धरती ।
नव रुप देखो कैसे धरती ।।
झर झर झर नित निर्झर झरते ।
कल कल नद स्वर निनाद करते ।।
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।।२।।
मेघा बरसे बिजली दमके ।
पावस जल सम इतउत चमके ।।
जल बुँद चूमे झूमे अचला ।
धरणी हर्षित आँचल सजला ।।
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।।३।।
कूके कोयल डाली डाली ।
चले पवन सरस मतवाली ।।
झीं झीं वाणी झींगुर बोले ।
टर टर दादुर बोले हौले ।।
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।।४।।
देखो ये ऋतु वर्षा आए ।
काले बादल नभ पर छाए ।।
हलधर उर ऋतु अति ही भाए ।
गीत खुशी के तन मन गाए ।।
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।।५।।
यत्र तत्र भू हरियाली छाई ।
धरणी सुरभित सौंधी आई ।।
तृप्ति धरा है पावस आए ।
नव रुप नव सुख पावस लाए ।।
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।।६।।
पंछी अति ही कलरव करते ।
कलकल नद स्वर मनभर बहते ।।
निर्झर झरना झर झर झरते ।
सरबस बरबस मन को रिझते ।।
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।।७।।
इस पर निर्भर जग यह सारा ।
टिम टिम करते नभ पर तारा ।।
देखो पावस शोभा छाए ।
प्राणी पादप खुशियाँ पाए ।।
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रचनाकार
प्रवीण कुमार ठाकुर
बहुत सुंदर रचना ठाकुरजी।
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