जिला:- रायगढ़ ,छत्तीसगढ़
विषय:- प्रेम
शीर्षक:- प्रेम की परिभाषा
विधा:- मुक्तक
*प्रेम की परिभाषा*
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है प्रेम पूजा की हवन, त्याग तप बलिदान है।
मन मृगतृष्णा तो ,हृदय
शैल समान है।
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प्रीत रीत की निशब्द भाषा,जीवन की हर आशा है।
नित नए सम्बन्धो की रचना,रचती अनमोल परिभाषा है।।
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श्रावण कुमार की प्रेम विपाशा, हर मात पिता को अर्पण है ।
भरत- राम की भातृत्व प्रेम ,युगों युगों का दर्पण है।।
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मौत से मीत लगा कर्ण ने,मैत्रीय प्रेम की लिख दी गाथा।
धोकर पांव कृष्ण ने,सुदामा की हर ली हर बाधा।।
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दुख झेलकर सीता ने पति प्रेम की रीत निभाई।
जंग लड़कर सावित्री ने ,यम लोक में हाहाकार मचाई।।
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प्रेमवश प्रेयसी बनी, मीरा लाज गंवाई।
एकलव्य की अनन्य गुरु प्रेम ने,द्रोण की शीश नवाई।।
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रावण का ये कैसा प्रेम,जान पर भारी बहन की आन।
भक्त के प्रेम में हार गए भगवन,चाहे प्रह्लाद हो या हनुमान।।
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देश प्रेम की अगन लगी,प्राण गवा दी जुनून में।
भगत आजाद का कैसा प्रेम,रंग दी धरती खून में।।
अजय पटनायक
Very nice patnayak ji
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद
Deletewah kya bat hai bahut sundr rachna
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद
Deleteprem ki sundar paribhasha
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद
Deletejitani bhi tarif ki jay kam h
ReplyDeleteVery nive
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