जिला :- महासमुंद
विधा :- कविता
अलंकार :- यमक अलंकार
हां मैं किसान हूं।
हूं मैं कर्मठ बड़ा,
अपने कर के बल पर,
हर काज सकल कर जाता हूं।
हल चलाकर बंजर भूमि में,
जन जन के भोजन का मसला,
मैं हल कर जाता हूं।
जो उठते प्रश्न उदर के हो,
उसका मैं निदान हूं।
हां मैं किसान हूं।
हां मैं किसान हूं।
सुबह - सुबह ही निकल पड़ता हूं,
शाम ढले घर आता हूं,
सुस्ताऊं उस दिन, जब जीवन की शाम हो,
यह सोच रोज ही कमाता हूं।
सेवा करता, दिन रैन धरा की,
धरती मां का सच्चा संतान हूं।
हां मैं किसान हूं।
हां मैं किसान हूं।
है पूज्य ये पावन धरा,
बोंकर बीज इसमें मैं,
करता मेहनत धीरज धरा,
सिंचित करता हूं जो खून पसीना,
जर्रा - जर्रा होता हरा - भरा,
पालूं जहां को, मैं वितान हूं।
हां मैं किसान हूं।
हां मैं किसान हूं।
व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने किसान जो कि धरती के सच्चे संतान हैं के मेहनत और लगन को अपने शब्दों में पिरोने का प्रयास किया है।
इस कविता को यमक अलंकार से अलंकृत किया है जिसमें कुछ शब्दों की पुनरावृत्ति हुई है और हर बार उनके अर्थ भिन्न-भिन्न हैं जैसे:-
कर :- हाथ
कर :- किसी कार्य को करना
हल :- खेतों की जुताई करने वाला यंत्र
हल:- समाधान
शाम :- संध्या काल
शाम :- जीवन का अंत/ मृत्यु
धरा :- धरती
धरा :- धारण करना।
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